हमारे जीवन में शुद्ध एवं ताजी हवा, शुद्ध जल और संतुलित भोजन का महत्वपूर्ण स्थान है। इनकी कमी से तरह-तरह की बीमारियाँ हमारे शरीर में हो जाती हैं। अतः इनकी शुद्धता पर ध्यान देना आवश्यक है। जल मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। हम दिनभर नहाने, धोने, पीने तथा कई अन्य कार्यों के लिए जल का उपयोग करते हैं। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत जल रहता है। प्रत्येक व्यक्ति को दिनभर पीने के लिए लगभग दो से तीन लीटर तक पानी की आवश्यकता होती है। तालाबों, नदियों, कुओं तथा नहरों आदि के पानी को पीने में उपयोग किया जाता है। उसी जल का उपयोग कुछ व्यक्ति, पशुओं को पानी पिलाने, नहलाने, स्वयं के नहाने, कपड़े धोने तथा बर्तनों को साफ करने में करते हैं, जिससे जल दूषित हो जाता है। लोग नदी एवं तालाब के आस-पास शौच भी करते हैं। इनसे कीटाणु पानी में पहुँचते हैं और उसे दूषित कर देते हैं। इसी पानी को हम अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं। बड़े-बड़े कल-कारखानों से निकलने वाले हानिकारक रासायनिक पदार्थ पानी में मिलते हैं, जिससे भी पानी दूषित हो जाता है। संपूर्ण भारत में पाई जाने वाली सभी बीमारियों में लगभग 40 प्रतिशत बीमारियाँ अकेले अशुद्ध पानी पीने के कारण फैलती हैं। दूषित जल से होने वाली हानियाँ दूषित जल से हैजा, खुजली, पेचिश, पाचन एवं आंत संबंधी रोग होते हैं। दूषित जल में जलीय वनस्पतियाँ अच्छी तरह पनप नहीं पाती हैं। मानव शरीर में जल का उपयोग हमारे शरीर में जल निरंतर कार्यों में उपयोगी हैः- पाचन क्रिया को सही रखता है। जल हमारी प्यास बुझाता है। शरीर के हानिकारक तात्वों को पसीने व मल-मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकालने में सहायता करता है। यह खून को तरल बनाता है तथा शारीरिक तापमान को स्थिर बनाए रखता है। शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक है। अपने साथियों से चर्चा करके दूषित जल से होने वाली बीमारियों की सूची बनाइए। वायु की शुद्धता-वायु हमारे जीवन का मुख्य आधार है। इसके अभाव में हम जीवित नहीं रह सकते हैं। मनुष्य ही नहीं बिल्क पेड़-पौधे व सभी जीवों के लिए वायु एक अनिवार्य तत्व है। शुद्ध वायु शरीर में प्रवेश कर रक्त को शुद्ध करती है, जिससे शरीर स्वस्थ रहता है। दूषित वायु से होने वाली हानियाँ भी होती हैं। आस-पास की शुद्धता एवं वृक्षारोपण अपने स्वास्थ्य के लिए अपने घर एवं विद्यालय के आस-पास की शुद्धता का विशेष महत्व है। इसके लिए हमें निम्नलिखित बातों पर ध्यान रखना अत्यावश्यक है- घर एवं विद्यालय से गंदा पानी निकलने की उचित व्यवस्था हो। आस-पास गंदा पानी इकट्ठा न होने दें। समय-समय पर कीटाणु नाशक दवा का छिड़काव कराएं। घर/विद्यालय आदि के कूड़े-कचरे को यथास्थान कूड़ेदान में डालें। पॉलीथीन का उपयोग न करें। उसके स्थान पर कपड़े की थैलियों का उपयोग करें। वातावरण को शुद्ध एवं सुंदर बनाने के लिए अधिक से अधिक पौधे लगाएं एवं उनकी देखभाल करें। घर/विद्यालय में निर्मित शौचालय का उपयोग करें, खुले में शौच न करें। भोजन विषाक्तता (Food Poisoning) स्वस्थ रहने के लिए भोजन पदार्थों की शुद्धता का विशेष महत्व है। यदि भोजन पदार्थों की साफ-सफाई का ध्यान न रखा जाए तो उनमें हानिकारक बैक्टीरिया पहुँच जाते हैं। जब उस भोजन को कोई खाता है तो हानिकारक बैक्टीरिया शरीर में पहुँचकर संक्रमण फैलाते हैं, जिससे व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है। इस प्रकार बैक्टीरिया/जीवाणु द्वारा भोजन का खराब होना ही भोजन की विषाक्तता है। भोजन के विषाक्त होने के कारण सभी प्रकार के कचे या पके हुए भोजन कुछ समय के बाद खराब हो जाते हैं। खराब होने के बाद भोजन विषैला, दूषित तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाता है। भोजन निम्नलिखित कारणों से खराब होता है- पकी हुई दालें, सब्जियाँ, दूध, दही आदि को अधिक समय तक रखने से, जीवाणुओं/कीटाणुओं के संपर्क में आने से। बिना पका हुआ भोजन जैसे गेहूँ, चावल, दाल आदि कीड़ा लगने या जीवाणुओं के संपर्क से। बीमार पशुओं के दूध या मांस का उपयोग करने से। संरक्षित भोजन को, समय के उपरांत उपयोग करने से। बासी भोजन खाने एवं गंदे हाथों से भोजन करने से। विषाक्त भोजन से होने वाली हानियाँ पेट में दर्द होना, जी मिचलाना, दाँत होना एवं बुखार आ जाना। मांसपेशियों में ऐठन एवं नाड़ी की गति का तेज हो जाना। भोजन पदार्थों के संरक्षण के उपाय अनाज तथा दालों को भंडारण के पूर्व ठीक तरह से सुखाकर, साफ कर उचित जगह पर रखें। पकाने से पूर्व भोजन पदार्थों को शुद्ध पानी से अच्छी तरह धोएं। वातावरण में दूषित कीटाणु/जीवाणु से बचने के लिए भोजन पदार्थों को बंद डिब्बों में रखें। भोजन पकाने के पूर्व हाथों को साबुन एवं पानी से अच्छी तरह धोएं। भोजन पकाते समय छींक व खाँसी से भोजन को सुरक्षित रखें। भोजन पदार्थों को सदैव ढक कर रखें। नमी वाले स्थान पर भोजन पदार्थों को संरक्षित न करें। अनाजों के संरक्षण हेतु उपयोग में लाये